- भोजापुर में श्रीमद भागवत कथा के चौथे दिन भक्ति रस से सराबोर हुए भक्त
Chandauli news : शारदीय नवरात्री के उपलक्ष्य में सकलडीहा के भोजापुर में चल रहे नौ दिवसीय भागवत कथा यज्ञ मे चौथे दिन काशी से पधारे ब्यास संजय त्रिपाठी ने कहा कि भगवान भाव के भूखे होते है। उन्हें निश्चल व्यक्ति पसंद है।

भोजापुर में चल रहे भागवत कथा के चतुर्थ दिन काशी से आये ब्यास संजय त्रिपाठी ने अढया कि कथा सुनाकर भक्त व भगवान के बीच कि दूरी को समझाया। अढ़ाई नामक के ब्यक्ति था जो बहुत ही भोला व भगवान का भक्त था। घर मे सबसे अधिक खाने वाला व्यक्ति था। लेकिन काम नहीं करता था। परिवार के लोग उसे खेत कि रखवाली के लिए लगा दिए। जहाँ दर्जनों कि संख्या में चिड़ियां खेत मे पहुंचकर फ़सल को खा रही थी लेकिन यह भागा नहीं रहे थे जिससे नाराज होकर परिवाए के लोंगो ने धक्का मारकर भगा दिए। घर से भगाने के बाद अधैया एक संत के आश्रम पहुंच गए। जहाँ वह आराम से रहने लगे। लेकिन इसी बीच एकादशी पड़ गयी। आश्रम के भोजनालय बंद था। उसने अपने गुरु ज़ी कहा कि हम तो एकादशी नहीं करेंगे। जिसके बाद गुरु के आदेश से उसे राशन दिया गया। लेकिन गुरु ने कहा कि कि बिना भगवान को भोग लगाए खाना मत। गुरु का आज्ञा पाकर नदी किनारे जाकर उसने खाना बनाया इसके बाद खाने से पूर्व उसे गुरु कि बात याद आ गयी। फिर भक्त ने भगवान को बुलाया। भगवान को आने में देर हुआ तो कहा रूखी सुखी रोटी है प्रभु यहां नहीं आचमनी अर्घा आरती, यही यहाँ मेहमानी, रुखी रोटी पाओ प्रेम से, पियो नदी का पानी… भूल करोगे यदि तज दोगे, भोजन रुखे सुखे, एकादशी आज मन्दिर में, बैठे रहोगे भूखे।”
भगवान इसके बाद आकर भक्त का भोजन करते है। यह क्रम हर एकादशी को हऑनव लगा। यह आश्रम से हमेशा बढ़ा के राशन मांगने लगा। जिसपर गुरु के में मे संदेह उपजा। वह अगले एकादशी के दिन चोरी से अधईया के पीछे लगा गए। उधर हर बार कि तरह इस बार बिना भोजन बनाये ही भगवान को बुला लिया। भगवान पूरा कुटुंब सहित उपस्थित हो गए। लेकिन वहां भोजन कि जगह केवल राशन रखा था। इसपर भगवान ने पूछा आज बिना बनाये बुला लिए तो भक्त ने कहा आज अपने से बनाओ और खाओ। भगवान व भक्त के बीच का वार्ता उसके गुरु को दिख नहीं रहा था। जन गुरु ने पास जाकर पूछा कि भोजन पका नहीं रहे हो तो शिष्य ने कहा माँ अन्नपूर्णा खुद पका रही है। भक्त व भगवान के बीच का दृश्य अबूझ बन गयी तो भक्त न भगवान से पूछा प्रभु हमें दिख रहे है गुरु ज़ी को नहीं। तब भगवान ने कहा कि तुम्हारी भक्ति निश्चल है। जबकि गुरु कि भक्ति मेने अहंकार है।