- भोजापुर में नौ दिवसीय भागवत कथा यज्ञ के चौथे दिन नंद के लाला का हुआ जन्म
- भगवान श्रीकृष्ण के जन्म पर झूमें भक्त
Chandauli news : भक्त के लिये भगवान जितना सरल है उतना सरल इंसान भी नही है। अपने भक्तों के लिये भगवान कहीं भी रह सकते है। उक्त बातें गुरुवार के दिन सकलडीहा के भोजापुर गांव में शारदीय नवरात्रि के उपलक्ष्य में चल रहे श्रीमद भागवत ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन काशी से पधारे ब्यास संजय त्रिपाठी ने ग्राहय से जकडे गज के उबरने से लेकर बलि के कब्जे में राज सिन्हासन लेकर पुनः देवताओं को वापस करने का कथा विस्तार से सुनाया। भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद श्रद्धांलु जमकर झूमें।

उन्होंने राजा परीक्षित को शुकदेवजी ने कथा सुनाते हुए कहा की मन्वंतर में भगवान ने आकूति के गर्भ से यज्ञपुरुष के रूप में प्रकट होकर धर्म का उपदेश किया और देवहूति से कपिल के रूप में प्रकट होकर ज्ञान का उपदेश दिया। मनु ने सभी भोगों से विरक्त होकर राज्य त्याग दिया और अपनी पत्नी शतरूपा के साथ तपस्या के लिए वन चले गए। वे सुनन्दा नदी के किनारे एक पैर पर खड़े होकर सौ वर्षों तक कठोर तपस्या करते रहे। एक दिन जब वे ध्यान में लीन थे और वेद का पाठ कर रहे थे, तो अचानक उसी समय भूखे असुर और राक्षस उन्हें खाने के लिए टूट पड़े। यह देखकर अन्तर्यामी भगवान यज्ञपुरुष अपने पुत्र याम नामक देवताओं के साथ वहां पहुंचे और उन असुरों का वध कर दिया। इसके बाद वे इन्द्र के पद पर प्रतिष्ठित हुए और स्वर्ग का संचालन करने लगे।
तब राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से पूछा-मुनिवर हम आपसे यह सुनना चाहते हैं कि भगवान गजेन्द्रको ग्राहके फंदेसे कैसे छुड़ाया था। श्री शुकदेवजी ने बताया कि क्षीरसागर में त्रिकूट नाम का एक भव्य पर्वत था, जो दस हजार योजन ऊँचा था। उसमें चाँदी, सोने और रत्नों से जड़े अनेक शिखर थे, जिससे दिशाएँ और आकाश चमकते रहते थे। उस पर्वत पर सुंदर झरने, हरे-भरे पेड़, लताएँ और रंग-बिरंगे फूलों से भरे देवताओं के उद्यान थे। सिद्ध, गंधर्व, किन्नर, नाग और अप्सराएँ वहाँ विहार करती थीं। पर्वत की तलहटी में भगवान वरुण का एक दिव्य उद्यान ‘ऋतुमान’ था, जिसमें देवांगनाएँ क्रीड़ा करती थीं। वहां अनेक प्रकार के फल-फूलों से लदे वृक्ष थे और एक सुंदर सरोवर था जिसमें स्वर्ण कमल खिले थे। उस जल में पक्षी, मछलियाँ और कछुए थे, और वहां की सुगंधित वायु आनंददायक थी।
उस त्रिकूट पर्वत के सुंदर और घने जंगल में गजेन्द्र नाम का एक अत्यंत बलवान हाथी रहता था। वह बहुत-सी हथिनियों और हाथियों का राजा था। उसके साथ उसका पूरा झुंड-छोटे हाथी, बड़ी हथिनियाँ – सदैव साथ चलते थे। उसकी गंध मात्र से जंगल के सिंह, बाघ, गैंडे, नाग और अन्य हिंसक जीव भयभीत होकर भाग जाते थे। वहीं दूसरी ओर उसकी शक्ति और संरक्षण के कारण छोटे जीव-हरिण, सूअर, बंदर आदि निर्भय होकर विचरते थे।
एक दिन गर्मी बहुत अधिक थी और झुंड को प्यास सताने लगी। गजेन्द्र ने दूर से सरोवर की सुगंधित, ठंडी वायु की अनुभूति की और अपनी हथिनियों सहित तेजी से उस दिशा में बढ़ा। वह सुंदर सरोवर जल से भरा था, जहाँ कमल खिले थे और चारों ओर पुष्पों की सुगंध फैली हुई थी। गजेन्द्र उस सरोवर में घुस गया। पहलेउसने खूब पानी पिया, फिर स्नान किया। वह थकावट मिटाकर बहुत प्रसन्न हुआ। फिर वह गृहस्थ पुरुष की तरह ममता में बँध गया-अपनी सूँड़ से हथिनियों और बच्चों को स्नान कराने लगा, उन्हें पानी पिलाने लगा, उनके साथ खेल में मग्न हो गया।
जब गजेन्द्र अत्यधिक गर्व और उन्माद में डूबा हुआ था, तभी प्रारब्ध के प्रभाव से एक बलवान ग्राह (मगरमच्छ) ने क्रोध में आकर उसका पैर पकड़ लिया। अचानक आई इस विपत्ति में फँसकर गजेन्द्र ने अपनी पूरी शक्ति से स्वयं को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, परंतु वह सफल नहीं हो सका। उसके साथ के अन्य हाथी, हथिनियाँ और उनके बच्चे यह देखकर बहुत घबरा गये कि उनका स्वामी एक बलवान मगरमच्छ द्वारा पानी में तेजी से खींचा जा रहा है। वे दुःख से व्याकुल होकर चिंघाड़ने लगे और उसे बचाने के लिए पूरी कोशिश की, लेकिन वे भी उसे बाहर निकालने में असमर्थ रहे।
अब गजेन्द्र और ग्राह दोनों अपनी पूरी ताकत लगाकर युद्ध कर रहे थे। कभी गजेन्द्र ग्राह को बाहर खींचता, तो कभी ग्राह उसे पानी के भीतर खींच लेता। इस तरह वे जल में भिड़े रहे। शुकदेवजी कहते हैं – हे परीक्षित ! इस संघर्ष में हजार वर्ष बीत गये, पर कोई भी हार नहीं माना। यह दृश्य देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो गये। लेकिन अंततः लगातार पानी में घसीटे जाने से गजेन्द्र का शरीर कमजोर पड़ गया, उसका बल और उत्साह क्षीण हो गया। जबकि ग्राह तो जलचर था, इसलिए समय के साथ उसकी शक्ति और बढ़ती जा रही थी। अब वह और जोश के साथ गजेन्द्र को खींचने लगा।